दिव्यांग होकर भी इन पैरा-एथलीट ने भारत को दिलाया है मेडल, कहानी प्रेरणादायक

5 दिव्यांग खिलाड़ी जिन्होंने अपने प्रदर्शन और जज्बे से देश को अन्तराष्ट्रीय स्तर पर कई मेडल जिताया है. इनकी कहानी बहुत ही प्रेरणादायक है.

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कहते हैं ज़िन्दगी संघर्ष का नाम है। लेकिन किसी-किसी के लिए यह संघर्ष बहुत ही दर्दनाक और मुसीबत भरा होता है लेकिन अपने जज्बे और टैलेंट से कभी-कभी वे ऐसा काम कर जाते है जिससे हर कोई हैरान रह जाता है। हम बात कर रहे हैं दिव्यांग व्यक्तियों की। जब भी खेल में दिव्यांग व्यक्तियों के प्रदर्शन और उपलब्धि की बात आती है तो वह अपने जज्बे और मेहनत से ऐसी इबारत लिखते हैं जिससे सामान्य भी हैरान हो जाता है। 

आइये आज हम ऐसे ही 5 दिव्यांग खिलाड़ियों के बारें में बात करें जिन्होंने अपने प्रदर्शन से देश का सिर गर्व से ऊंचा किया है और उन लाखों लोगों को जीने की और कुछ कर गुजरने की उम्मीद दी है जो शारीरिक अक्षमता के कारण उम्मीदे खो चुके हैं। 

1- मारियप्पन थंगावेलु 

तमिलनाडु के रहने वाले मारियप्पन थंगावेलु हाई जम्प एथलीट हैं। वह 2016 में हुए रियो पैरालम्पिक में हाई जम्प T-42 कैटेगरी में गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। 2004 के बाद से वह पैरालम्पिक में गोल्ड मेडल जीतने वाले पहले भारतीय है। 

Mariyappan Thangavelu

मारियप्पन को भारत सरकार ने उनकी उपलब्धि के 2017 में पद्म श्री अवार्ड से सम्मानित किया। इसी साल खेल में उनके योगदान के लिए अर्जुन अवार्ड से भी सम्मानित किया गया था। 

मारियप्पन की जिंदगी इतनी आसान नहीं रही है। उनके 5 भाई-बहन थे। बचपन में ही उनके पापा ने उन्हें और उनके पाँचों भाई-बहनों को छोड़ दिया था। जब वह 5 साल के थे तो स्कूल जाते हुए एक शराबी ट्रक ड्राइवर ने उनके दाहिने पैर पर ट्रक चढ़ा दिया। जिससे वह अपाहिज हो गए। 

मारियप्पन अपने स्चूली दिनों में बॉलीबॉल खेला करते थे। लेकिन उनके स्कूल के एक फिजकल एजुकेशन के टीचर ने उन्हें हाई-जम्पिंग करने को कहा। टीचर ने इसके लिए उन्हें ट्रेनिंग करवाई। 14 साल की उम्र में मारियप्पन ने फिट लोगों की हाई-जम्पिंग कम्पटीशन में दूसरा स्थान प्राप्त किया था। रियो पैरालम्पिक में गोल्ड जीतकर उन्होंने कर दिखाया की जब जज्बा हो तो कोई भी काम मुश्किल नहीं होता है। 

2- देवेंद्र झाझरिया 

देवेंद्र एक भारतीय पैरालम्पिक भाला फेंकने  वाले खिलाड़ी हैं। उन्होंने अबतक पैरालिंपिक में दो स्वर्ण पदक जीतने वाले पहले भारतीय पैरालिंपियन है। उन्होंने एथेंस में आयोजित हुए 2004 पैरालिम्पिक्स में जेवलिन थ्रो में अपना पहला स्वर्ण हासिल किया। रियो डी जनेरियो में 2016 ग्रीष्मकालीन पैरालिंपिक में उन्होंने इसी कॉम्पिटिशन में दूसरा स्वर्ण पदक जीता और अपने पिछले रिकॉर्ड में सुधार किया।

Devendra Jhajharia

उन्हें 2017 में राजीव गांधी खेल रत्न पुरस्कार, 2012 में पद्म श्री और 2004 में अर्जुन पुरस्कार से सम्मानित किया गया है।

राजस्थान के रहने वाले देवेंद्र जब 8 साल के थे तो उन्होंने पेड़ पर चढ़ते हुए एक नंगे करंट वाले तार को छू लिया था। जिससे वह करंट से झुलस गए। जिसकी वजह से उनका बायां हाथ काटना पड़ा। हालांकि इस घटना ने भी खेल में उनकी रूचि को ख़त्म नहीं किया। आज वह खेल का सबसे बड़ा पुरुस्कार 'राजीव गांधी खेल रत्न' पाकर तमाम दिव्यान्गों के लिए प्रेरणा के स्त्रोत बने हुए हैं। 

3- वरुण भाटी 

वरुण भाटी 2016 के पैरालम्पिक में हाई जम्प स्पर्धा में ब्रांज मेडल जीत चुके है। इसके अलावा वह 2014 चाइना ओपन में वह गोल्ड मेडल जीत चुके हैं। 

VArun Bhati

वरुण भाटी ग्रेटर नोयडा के रहने वाले हैं। बहुत ही कम उम्र में उन्हें पोलियो हो गया था। जिसकी वजह से वह अपाहिज हो गए थे। लेकिन इसके बावजूद उन्होंने अपने जूनून और जज्बे के दम पर देश का प्रतिनिधित्व किया और मेडल जीतकर भारत का और हजारों दिव्यांग लोगों का उत्साहवर्धन किया। 

4- सुयश यादव 

महाराष्ट्र के रहने वाले सुयश यादव  S7 कैटेगरी में भारतीय पैरा स्विमर (तैराक) हैं। सुयश के दोनों हाथ नहीं है। उन्होंने रियो में 2016 पैरालिंपिक के लिए ’ए’ क्वालीफाइंग मार्क हासिल किया है और ऐसा करने वाले वह एकमात्र भारतीय पैरा तैराक माने जाते है।

Suyash Yadav

उन्होंने अंतर्राष्ट्रीय व्हीलचेयर और एमपुति स्पोर्ट्स फेडरेशन द्वारा आयोजित रूस के सोची में 2015 आईडब्ल्यूएएस विश्व खेलों में एक रजत और एक कांस्य पदक जीता।

सुयश के पिता राष्ट्रीय स्तर के तैराक थे। सुयश भी अपने पिता की तरह तैराक बनना चाहते थे और भारत का नेतृत्व ओलम्पिक में करना चाहते थे। लेकिन जब वह छठवीं क्लास में थे तो बिजली की ख़राब वायरिंग होने के नाते उन्हें करंट लग गया। जिसकी वजह से उनके दोनों हाथ कट गए। 

इस घटना के बावजूद सुयश ने भारत का प्रतिनिधित्व करने का सपना नहीं छोड़ा। पैरालंपिक में भारत की तरफ से 'A' मार्क पाकर वह पहले भारतीय बने। इस तरह से उन्होंने अपने जज्बे से दिव्यांग के अलावा कई लाख लोगों को भी प्रोत्साहित किया है। 

5- अंकुर धामा 

Ankur Dhama

अंकुर धामा एक ब्लाइंड रनर हैं। पैरालम्पिक के 30 साल के इतिहास में वह देश के पहले अंधे एथलीट हैं उन्होंने वर्ष 2016 में रियो डी जनेरियो, ब्राज़ील में पैरालंपिक में भाग लिया था। दिल्ली विश्वविद्यालय में एमए के छात्र रह चुके धामा ने अपने साथी विपिन कुमार के साथ पैरालिंपिक में मध्य-दूरी स्पर्धा में भाग लिया था।

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धामा ने 2014 में एशियाई पैरा खेलों में भाग लिया और दो कांस्य और एक रजत जीता। उन्होंने मार्च 2016 में दुबई में एशिया-ओशिनिया चैंपियनशिप में पैरालिंपिक के लिए भी क्वालीफाई किया था।